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Sawan Somwar: दुनिया सुखी कैसे होगी ? परमात्मा की बातों को ध्यान से सुनों

यदि आप गूगल सर्च में केवल सावन लिखोगे तो आपको सावन में शिव की पूजा…सावन सोमवारी (sawan somwar) कब है जैसे सर्च दिखेंगे. लेकिन क्या किसी खास दिन…किसी खास की पूजा करने से आपको सुख की प्राप्ति हो जाएगी. यह सवाल खुद से एकांत में करना. खैर सुख के बारे में परमात्मा क्या कहते हैं, उसे ध्यान से सुनने की जरूरत है. एक ने प्रश्न पूछा परमात्मा तुम कहते हो तुम दुनिया को सुख के रास्ते पर लेकर जा रहे हो. लेकिन दुनिया सुखी तो हो नहीं रही. दुनिया सुखी तो दिखती नहीं है. तो परमात्मा सुख कैसे मिलेगा. दुनिया सुखी आनंदित या यूं कहें उत्सव में कब होगी.

दुनिया किसके कारण अशांत है (Sawan Somwar) ?

केवल तुम लोगों के बदलने से दुनिया सुखी होगी. केवल मेरे कहने से यह काम होने वाला नहीं है. मैं तुम्हें एक विचारधारा दे रहा हूं. चलना तो तुम्हें ही पड़ेगा. कृष्ण जब आये तो वो भी एक विचारधारा देकर गये. वो सारे संसार को धार्मिक थोड़े ना बना गये. क्या बुद्ध बना गये या महावीर बना गये. कृष्ण, बुद्ध, महावीर , मोहम्मद प्रेम के दीवाने थे. क्या सबको प्रेम में बना गये. क्या आज इस्लाम में तुम्हें प्रेम दिखता है. इस्लाम छोड़ दो…क्या हिंदू में प्रेम दिखता है ? सिख में…ईसाई में….और सिख के प्रेम आजकल तुम रोज सोशल मीडिया पर देखते ही होगे. रोज उनके प्रेम के चर्चे फेसबुक पर तुम्हें दिख ही जाते हैं. कितना प्रेम है. दुनिया आज भी सुखी हो सकती है. आनंदित हो सकती है. इतनी खुशहाल हो सकती है कि हर व्यक्ति को रोटी मिले. पैरों में पहनने के लिए जूता-चप्पल मिले. सिर ढकने के लिए छत मिले. लेकिन ये हो क्यों नहीं पा रहा है ? पता है इसका जवाब क्या है…केवल कुछ लोगों के कारण…चंद लोगों के कारण…वो शख्स जो धन के लिए पागल है. पद के लिए पागल है जिन्हें केवल अपना बैंक बैलेंस बढ़ाना है. जिन्हें मीडिया की सुर्खियों में रहना है. केवल ऐसे लोगों के कारण ही दुनिया अशांत है.

आर्थिक समानता क्यों है जरूरी ?

ऐसे अशांत लोगों की लिस्ट तुम गूगल पर सर्च कर सकते हो (Sawan Somwar). चोटी पर जो आपको नजर आएंगे या यूं कहें अमिरों के शीर्ष पर जो आपको दिखेंगे. जरा उनके चेहरों पर गौर करना. उनमें किसी के चेहरे पर या उनकी आंखों में तुम प्रेम ढूंढ नहीं पाओगे. क्योंकि ऐसे लोगों का मोह या रुझान तो धन के प्रति है. उनका प्रेम तो शायद अपनी पत्नी और बच्चों के साथ भी नहीं है. धन जरूरी है. आवश्यक है. लेकिन इतना भी जरूरी नहीं है कि उसके लिए जीवन को ही दांव पर लगाया जाए.  इस दौड़ में शामिल लोगों में, खासकर हम अपने देश का आंकलन करें तो ध्यान से देखना सारे राजनेता…सारे धार्मिक नेता…सारे अभिनेता…सारे ही आते हैं. शायद ये जो तीन कैटेगरी मैंने तुम्हें बतायी है. शायद इनमें से दो-चार विरले ही बचे हैं. लेकिन बेचारे उन दो-चार की गिनती कहां आती है. अगर हमें इस दुनिया को सुंदर बनाना है. स्वर्ग के रूप में देखना है. तो हमें मजबूरन आर्थिक समानता लानी ही पड़ेगी. और ये हमारी नहीं..हमारे देश की नहीं..पूरी दुनिया की मजबूरी है. मैं जो तुम्हें समझा रहा हूं. मैं जिस पथ पर तुम्हें ले जा रहा हूं. उस पथ पर तुम्हारी दुनिया…तुम्हारा जीवन…तुम्हारा संसार…आज ही सुखी हो सकता है.

दुख का घर है क्या ?

और मैं यही तो कर रहा हूं. मैं तुम्हें सुखी करने का प्रयत्न कर रहा हूं. आज..अभी..यहीं और इसी देह में…इस देह के बाद वाले सुख की मैं तुम्हें सांत्वना नहीं दे रहा हूं. क्योंकि मैं तुम्हारे उन मूढ़ताओं भरे शास्त्रों के वचनों को तो मानता ही नहीं हूं. तुम्हारे ही शास्त्र हैं ना जो कहते हैं दुखालयम…यानी ये दुख का घर है. यहां कुछ भी शास्वत नहीं है. एक अर्थ में तो शास्त्र में ठीक कहा गया है कि दुखालयम…दुख का घर…कोई भी चीज शास्वत नहीं, लेकिन जिन मूढ़ों ने इसकी व्याख्या की और उसपर लिख दिया यथारूप…उन्हीं मूढ़ों ने शास्त्र का सत्यानाश कर दिया. दुखालयम…दुख का घर…कौन सा…ये संसार नहीं जिसमें तुम रहते हो. पेड़, पौधे, पशु, पक्षी, नदियां, झरने, सागर…क्या ये तुम्हें दुखी नजर आते हैं. ये दुख का घर है. नहीं ये संसार दुख का घर नहीं है. वो संसार दुख का घर है जो तुमने अपने मन के भीतर बनाया है. परमात्मा के बनाये हुए ये पेड़, पौधे, पशु, पक्षी…ये दुखी नहीं हैं. और अशास्वत क्षणभंगुर है. यही शास्त्र तुम्हे समझाते हैं. क्या अशास्वत है.

अशास्वत क्या है?

वैज्ञानिक कहते हैं साठ हजार वर्ष पहले भी यहां पर जीवन था. और हजारों लाखों  वर्ष पहले ये ग्रह बन चुके थे. शायद उससे भी बहुत पहले…तो चार नये ग्रह फूटते हैं और चार नये बनते हैं. रोज एक लाख इक्यावन हजार के करीब लोग इस दुनिया से विदा ले लेते हैं यानी मरते हैं. अपनी मौत…एक्सीडेंट…बीमारी से ये मौतें होती हैं. और रोज तीन लाख से ज्यादा लोग इस दुनिया में आते हैं यानी जन्म लेते हैं. तो क्या जीवन मिटा…तो अशास्वत शब्द का प्रयोग किसके लिए किया गया. जीवन तो वहीं है…ये तो नित्य बढ़ रहा है. क्या जीवन कहीं कम हो रहा है..तो अशास्वत वो नहीं..पेड़-पौधे नहीं…तुम्हारी ‘मैं’ अशास्वत है. ‘मैं’ किसी की…कभी पूरी होती है. तुम आये और तुमने अपनी ‘मैं’ धरण कर ली. वो अशास्वत तीस वर्ष की अवस्था में या 25 वर्ष की अवस्था में तुमने ‘मैं’  को अपना प्रगाढ़ कर लिया. और पचास वर्ष की अवस्था होते होते तुम्हारी ‘मैं’  मिट जाती है. पता चल जाता है तुम्हें कि तुम्हारे चाहने से कुछ हुआ ही नहीं…हो ही नहीं रहा यहां…तुमसे 10-20 वर्ष पहले किसी और की ‘मैं’  थी. आज तुम हो और इसके 10-20 वर्ष बाद किसी और की ‘मैं’ आ जाएगी. बस यही है अशास्वत…पेड़ अशास्वत नहीं है. पक्षी अशास्वत नहीं है. जीवन अशास्वत नहीं है. दुख अशास्वत है. चाहो तो मिनटों में मिटा दो. सुख अशास्वत नहीं है. सुख तो बरस रहा है.

दृष्टा तुम भी बन सकते हो

इस बारिश के रितु में तुमने छाता ओढ़ लिया, फिर भी सुख बरस रहा है. और दुख से सुखी होने की जो क्रिया है, उसी का नाम है दृष्टा…जिस दिन तुम दृष्टा बन जाओगे अपने ही जीवन के…उसी दिन इन दोनों शब्दों का अर्थ बदल जाएगा. कौन से शब्द…दुखालयम…अशास्वतम (Sawan Somwar)…शब्द वहीं के वहीं रहेंगे. लेकिन जिन मूढ़ों ने व्याख्या करके तुम्हें बहकाया था. अब तुम उनके बहकाने से बाहर आ जाओगे. यही तो मैं तुम्हें कहता हूं. मैं तुम्हें कोई तुम्हारे शास्त्रों की कथा सुनाने नहीं आया हूं. मैं तो तुम्हें केवल जगाने आया हूं. तुम्हारी अंध भक्ति से…आंखें बंद करके जो तुम धर्म पर विश्वास करते हो…उससे जगाने आया हूं. और केवल इसे हिंदू से मत समझना…हिंदू मंदिर पर आंखें बंद करके विश्वास करता है. मुस्लिम मस्जिद पर…सिख ईसाई, बौद्ध, जैन…आज कौन आंखें खोलकर बैठा है. इन्हीं दोनों शब्दों को अर्थ बदल जाएगा तुम्हारे जागते ही…और तुम भी इसी दुनिया में रहकर मेरी तरह दुनिया को सुखी करने की दिशा में घूम जाओगे. ये दुनिया सुखी हो सकती है. बहुत ही आसानी से हो सकती है. तुम सब या कुछ वो व्यक्ति जो शीर्ष पर बैठे हैं. या तुम भी…जो पैसों की दौड़ में लगे हुए हो…उससे बाहर आ जाओ…मैं तुम्हें यहां कथा सुनाने नहीं जगाने आया हूं.

मेरी वेबसाइट पर जब तुम विजीट करोगे तो वहां तुम्हें लिखा नजर आएगा कि तू जाग जा और तू भाग जा…उपरोक्त कारणों की वजह से ही मैंने ये लिख रखा है. तुम जाग गये तो क्या करोगे मेरे पास आकर…क्या करोगे मुझे सुनकर…बन गये तुम भी दृष्टा…हो गये तुम भी साक्षी…घट गया तुम्हारा भी बुधत्व…तुम भी प्रज्ञावान हो गये. कृष्ण के शब्दों में (Sawan Somwar)..

अंत में केवल इतना ही…चारों ओर फैले परमात्मा को मेरा नमन…तुम सभी जागो…जागते रहो…

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