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Jagannath Rath Yatra 2022 : इस श्रृष्टी के तुम जगन्नाथ हो, जानें ‘परमात्मा’ क्या कहते हैं

Jagannath Rath Yatra 2022 : भगवान जगन्नाथ की बात करें तो ऐसी मान्यता है कि वे हिंदू देवता भगवान विष्णु के अवतार रूप हैं. लेकिन इस विषय पर ‘परमात्मा’ की बातें कुछ अलग और रोचक है. जी हां….…आइए जानते हैं ‘परमात्मा’ आखिर रथ यात्रा (Rath Yatra) के बारे में क्या सोचते हैं और वे इस संबंध में लोगों को क्या बताना चाहते हैं.

जागते रहो से शुरू करते हुए अपनी राय ‘परमात्मा’ (Parmatma, Parmatmana) रखते हैं.

एक ने प्रश्न पूछा कहता है परमात्मा ……….हिंदू रथयात्रा निकालते हैं. क्या ये सही है और इसका महत्व क्या है ?

जगन्नाथ (Jagannath Yatra) का मतलब क्या है ? तात्पर्य क्या है ? इसके ऊपर विस्तार से बताएं.

जगन्नाथ यानी जग के नाथ….…जग का पालन करने वाले…..…इस श्रृष्टी का पालन करने वाले….….कौन है जो इस श्रृष्टी का पालन करता है ? तुम्हारा पालन कौन करता है ? तुम्हारे घर का पालन कौन करता है ? श्रृष्टी को बसाने वाले और इसकी देखभाल करने वाले………

तुम्हारे घर का पालन तुम करते हो. और अपने घर के तुम जगन्नाथ हो.

और इस श्रृष्टी के तुम जगन्नाथ ( who is Jagannath) हो. तुम्हारे अलावा कोई जगन्नाथ कहीं नहीं बैठा है. हां………आया होगा………मैं आने पर तुम्हें शंका नहीं दे रहा हूं. कृष्ण आये ……ये सबको पता है. राम आये………बुद्ध आये………महावीर आये………प्रेम के मतवाले मोहम्मद आये………नानक आये…..…कबीर आये………लेकिन जो आये वो चले गये.

चले तुम भी जाओगे….… चला मैं भी जाऊंगा….… लेकिन सब अपने जीवन को आनंद से जीकर गये. अपने-अपने दम पर. तभी तो कृष्ण ने कहा कि पुराना सब भूल जाओ केवल मेरे को भजो…

बुद्ध ने भी तो यही कहा कि सब पुराना छोड़ दो………मैं जो कह रहा हूं. उसे सुनो …….

बुद्धम शरणम गच्छामि………

इसका मतलब गौतम बुद्ध की शरण में जाना नहीं था.

इसका तात्पर्य था बौध की शरण में जाओ अपने बोध की !

…महावीर ने घोषणा कर दी कि कोई परमात्मा नहीं………केवल आत्मा है ………अपने को देखो.

मोहम्मद ने कहा सब पुराना छोड़ दो………एक खुदा पर विश्वास करो.

केवल एक.!…… जब वो एक है तो दूसरे तो तुम भी नहीं बचे. एक जो हिंदू का सिद्धांत है ना  (अद्वैत  का), यहां उसी की घोषणा की जा रही है.

हां, मोहम्मद ऐसे इलाके में थे. जहां भाषा अलग थीं. तो उन्होंने उस भाषा में घोषणा कर दी. कि वो खुदा एक है वही सबपर रहमत करता है।

तुमने सोचा धर्म अलग है. संप्रदाय अलग है ?……….

धर्म !……

धर्म अलग हो ही नहीं सकते हैं. धर्म तो एक ही है, और वो है सत्य………उस धर्म का नाम है, स्वंय को देखना…बस सत्य को पहचान लो.

हाँ !  ……तुमने  सत्य को पहचानने के लिए अलग-अलग राह चुन राखी हैं. कोई हिंदू का रास्ता तो कोई मुस्लिम का………कोई सिख का कोई ईसाई का…कोई बौद्ध का तो कोई जैन का………

लेकिन धर्म तो एक है. तुम किसी पहाड‍़ पर चढ़ते हो. हिमालय पर………जहां तक कार जाती है. वहां तक पहुंचने के रास्ते तो हजारों हैं. कोई दिल्ली से चल रहा है, तो वह अलग रास्ता पकड़ेगा. कोई जम्मू से चल रहा है, वो अलग रास्ता पकड़ेगा. कोई अमेरिका से चल रहा है, वो पहले विमान से आएगा. कोई पैदल चल रहा है. गाय..भैंस…उसी पहाड़ पर पगडंडी पर चल रही है. उनका रास्ता अलग………कोई ट्रैकिंग कर रहा है उसका रास्ता अलग…लेकिन मंजिल एक…चोटी पर पहुंचेंगे तो, वो तो एक ही होगा.

तो धर्म एक है. उस धर्म का नाम है सत्य.!…… हिंदू भी सत्य को नहीं नकार पाता है. सिख, ईसाई, बौध, जैन भी ………

सत्य पर किसी का कब्जा नहीं है कि हिंदू के लिए सत्य है……….तो हम बात कर रहे थे जगन्नाथ (Jagannath Yatra) जिसने ये पूजा शुरू की उसने जो सत्य का अनुसंधान करने की जो मेहनत होती है, उससे बचने के लिए ऐसा किया कि पूजा शुरू कर दी।

जगन्नाथ (Jagannath Yatra) में कई चीजें सत्य है उसमे…जैसे 40 मन चावल का भोग…अब एक अकेला भगवान…एक अकेली मूर्ति इतना सेवन तो नहीं कर सकती है. जिसने भी शुरू किया होगा ना ये…वो जरूर बौध को प्राप्त हो गया होगा. वो प्रज्ञावान हो गया होगा. उस समय इतने लोग होंगे, वहां आस-पास कि वहां 40 मन चावल की खपत हो जाती होगी. तो उसने कहा कि तुम सब जगन्नाथ हो. तुम सबको भोग लगेगा 40 मन का.

वाकई में जगन्नाथ तुम ही हो…तुम्हारा होना ही सत्य है. लोग यात्रा निकालते हैं. नृत्य करते हैं. उत्सव मनाते हैं. कौन मनाता है उत्सव, क्या कभी सोचा है ? तुम सब कभी निकलते हो घर से…छुट्टियों में..पिकनिक मनाने….पहाड़ों पर जाते हो. नाचते हो…गाते हो और कहते हो चार दिन बहुत आनंद आया. इसका अर्थ क्या हुआ कि शेष बचे दिन तुम बिना आनंद के रहते हो.

एक ने मुझसे प्रश्न किया कि परमात्मा क्या स्वर्ग और नर्क होते हैं?………. मैंने जवाब दिया स्वर्ग का तो पता नहीं लेकिन नर्क जरूर है. वह व्यक्ति चौंक कर पूछता है. स्वर्ग नहीं ये पता नहीं…तो नर्क का पता कैसे चला ? मैंने कहा तुम अपना चेहरा देख लो और खुद से पूछो तुम स्वर्ग में रहते हो या नर्क में. अगर तुम्हारा स्वर्ग भविष्य में है…………स्वप्न में है.……… यह तुमको जप या तप करके मिलता है. मुसलमान को जन्नत हिंदू के कत्ल के बाद मिलता है. तो अभी वो नर्क में ही तो है. इसलिए जन्नत की कामना कर रहा है. तभी तो तुम स्वर्ग के सपनों में डूबे हुए हो कि यहां से जाएंगे. सत्य लोक होगा कोई…………कोई स्वर्ग होगा..कोई वैकुंठ होगा. वहां अपसराएं होंगी. तुम सोमरास का पान करोगे.

इसका मतलब नर्क में तो हो तुम, इसलिए स्वर्ग की कामना कर रहे हो. इसके इतर ज्ञानियों को देखो…वो आज स्वर्ग में हैं. उनका आनंद भविष्य में नहीं है. तो हम बात कर रहे थे जगन्नाथ रथ यात्रा की. यह उत्सव तो सालभर यानी 365 दिन होने चाहिए. हमारे पग-पग में संगीत होनी चाहिए. तुम्हारे मन मे वीणा बजनी चाहिए. जिस दिन ये वीणा बज जाएगी तो तुम्हारे लिए यही स्वर्ग होगा और यहीं वैकुंठ होगा. तुम ही जगन्नाथ होगे. अन्यथा तुम तो हजारों वर्षों से पूजा किये जा रहे हो दूसरे की…

मैंने पहले भी कहा था. सब एक ही काम कर रहे हैं और वो है दूसरे को पूजना.

सभी मृत पदार्थों की ही पूजा कर रहे हैं………………..

सभी मृत पदार्थों की पूजा कर रहे हैं. हिंदू खड़े पत्थर की (Ishwar) पूजा कर रहे हैं, मुसलमान लेटे पत्थर की, सिख कागज की, क्रिस्चियन लटके पत्थर की, बौद्ध मुंड की, जैन नग्न की…………सभी मृत की पूजा को ही अपना अपना धर्म मान रहे है।

पूजा तो जीवन की करनी थी.

पूजा तो जीवन की करनी थी. पहचानना भगवन को या आल्हा को नहीं था स्वयं को पहचानना था।  और उसका अनुभव हो सकता है स्वयं के दर्श करके।

उसके लिए एक  लोटा जल रोज अपने सिर पर डालो. चार फूल अपने चरणों पर रोज चढ़ाओ

जीनव की पूजा करना सिखो…………. जीवन ही परमात्मा है…………….

आज इतना ही ! अंत में चारों तरफ बिखरे फैले परमात्मा को मेरा नमन…तुम सभी जागो…जागते रहो…

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