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What is Bhed Buddhi: ‘भेद बुद्धि को मत बढ़ने दो’, जानें परमात्मा ने ऐसा क्यों कहा

कभी तुमने चांदनी रात में झील देखी (What is Bhed Buddhi)है. तरंग उठती है तो क्या होता है ? तरंग उठने से चांद का प्रतिबिम्ब अशांत हो गया. खो गया. जब तरंगें शांत हुई तो चांद का प्रतिबिम्ब पुन: बन गया. झील अशांत हुआ तो टुकड़ों में चांदनी पूरे झील में फैल गयी. हुआ क्या ? क्या चांद हिला…नहीं चांद वहीं था. लेकिन प्रतिबिम्ब जो झील में बन रहा था वह झील के अशांत होने के कारण मिट गया. प्रतिबिम्ब दिखाई नहीं दे रहा था. ठीक ऐसी ही चीज तुम्हारे मन में भी बीत रही है.

तुम्हें अपना अहंकार कब और कहां गिराना है (What is Bhed Buddhi)

तुम जब अशांत होते हो. जब तुम्हारे अंदर वासनाओं की लहर चलती है. हवा चलती है तो मन डोल जाता है. वासना होगी तो साक्षी भाव तितर-बितर हो जाएगा. तो तुम अपने मन से वासनाओं को हटाओ. तभी साक्षी हो पाओगे. तभी बोध जागृत होगा. यह घटना जब भी घटेगी. अभी घटेगी. तुम सोचो की दस वर्ष उपाय करेंगे तब घटेगी. यही सोचते रहे तो 100 वर्ष उपाय कर लोगे तो भी नहीं घटेगी. ध्यान देना जहां तुम अपने अहंकार को गिराओगे. वहीं घटेगी. अब तुम देख लो तुम्हें अपना अहंकार कब और कहां गिराना है.

मिट्टी तो मिट्टी है ना

ध्यान से सुनना. तुम प्रतीकों में अपना वक्त बिता देते हो. प्रतीक…मनुष्य प्रतीक को ज्यादा महत्व देता है. जैसे तुम्हारे घर की मिट्टी और मंदिर की मिट्टी…मिट्टी तो मिट्टी है ना…तुम मंदिर की मिट्टी को पूजते हो. और घर की मिट्टी कूड़ा है. इसी प्रकार तुम्हारे घर में जो ईंट लगी और मंदिर में जो ईंट लगी. क्या दोनों में अंतर है. तुम इस चीज को समझो… जानों. ज्यादा भेद बुद्धि को मत बढ़ने दो. भेद बुद्धि बढ़ाने वाले सोचते हैं कि मैं सबसे चालाक हूं. मुझे कोई धोखा नहीं दे सकता है. अंत वक्त आने पर वह इस बात को समझते हैं कि इसी भेद बुद्धि ने उन्हें पूरा जीवन भटकाया. और अंत समय बंधन में फंसाया.

देखो तुम मुक्त ही हो (What is Bhed Buddhi)

और वह व्यक्ति जो इस दुनिया में शांति से आते हैं. भोलेपन से जीवन जीते हैं और शांति से चले जाते हैं. ध्यान दो अष्टावक्र यही तो कह रहे हैं कि सत्य पाने का अधिकार सबको है. ज्ञान पाने का अधिकार है. मेरे पास सभी धर्म के लोग आते हैं. संन्यास लेते हैं और अष्टावक्र के ज्ञान के अनुसार चलते हैं. अष्टावक्र कहते हैं तुम सुनों..रुको…ठहरो…देखो तुम मुक्त ही हो. तुम इस बात को ध्यान से बैठकर सोचो. समझो…जागो…

आज केवल इतना ही…शेष किसी और दिन…अंत में चारों तरफ बिखरे फैले परमात्मा को मेरा नमन…तुम सभी जागो…जागते रहो…

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