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Wake up Yourself : न मंदिर जगाओ न मस्जिद, न श्मशान जगाओ, बस तुम जागो

ना मंदिर जगाओ…ना मस्जिद जगाओ…जागना है तो तुम स्वंय जागो (Wake up Yourself). धर्म क्या है. अध्यात्म क्या है. केवल जागरण का नाम…लेकिन तुम क्या करते हो. कोई अहले सुबह उठकर घंटा बजाकर भगवान को जगाने लगता है तो कोई सुबह अजान देकर अल्लाह को जगाने लगता है. कोई गिरजे में तो कोई गुरुद्वारे में परमात्मा को जगाने में लगा रहता है. यही तो तुम कर रहे हो. जागना खुद था और तुम दूसरे को जगाने में लग गये हो.

सब धर्म के नाम पर दूसरों को जगाने में लगे हैं (Wake up Yourself)

मैं भी एक मूढ़ तांत्रिक को जानता था. वो रात में 12 बजे जाकर श्मशान जगाया करता था. वो कहता था कि यही धर्म है. स्वंय कोई नहीं जागता…सब धर्म के नाम पर दूसरों को जगाने में लगे रहते हैं. और इन्हीं चक्कर में तुम घनचक्कर हुए जा रहे हो. इस सबको करके तुम क्या सिद्ध कर रहे हो. कोई स्वंय को धार्मिक दिखा रहा है. कोई श्मशान में तंत्र-मंत्र सिखकर मदारी बना घूम रहा है.

अपने अंदर का बोध जगाओ

पागलपन की हद होती है. ना मंदिरों में जाकर भगवान को जगाओ…भगवान भी कभी सोते हैं क्या…अगर परमात्मा सो जाएगा तो तुम क्या सोचते हो यह संसार चल पाएगा क्या… तुम स्वंय देखो जिस दिन तुम्हारे अंदर का परमात्मा सो जाता है. उस दिन देखना तुम्हारे ही सगे संबंधी तुम्हारा क्या हाल करते हैं. ना कुंडली जगाने की सोचो ना हवन में अग्नि जलाने की सोचो…और श्मशान में जाकर श्मशान जगाने की तो कभी सोचना भी मत…जगाना ही है तो अपने अंदर का बोध जगाओ…चैतन्य जगाओ. स्वंय जागे. ये बात ठीक लगती है. लेकिन तुम तो मूढ़ताओं की हद तक चले जाते हो.

सामाजिक सेवा के नाम पर धन इकठ्ठा करने का प्रचलन(Wake up Yourself)

यहां चारो ओर इन्हीं मूढ़ताओं की दुकानें चल रही हैं. देखो कुंडलनी के जागरण के नाम पर कितनी पुरानी दुकानें चल रहीं हैं. हां..ये बात अलग है कि उनमें से किसी की भी कुंडलनी अभी तक नहीं जागी. और जो जगाती थी (Wake up Yourself). गुरु मां बनकर बैठी थी. उसकी स्वंय की कुंडलनी सदा के लिए सो गयी. कर क्या रहे हो तुम…क्या तुमने कभी सुना है कि बुद्ध, कबीर, नानक जगाने के नाम पर कुछ करते थे. नहीं हमारे यहां के बुद्ध पुरुष किसी के चक्कर में नहीं पड़ते थे. ना ही सामाजिक सेवा में कोई आडंबर करते थे. लेकिन आज तो सामाजिक सेवा के नाम पर धर्म हो रहा है. सामाजिक सेवा के नाम पर धन इकठ्ठा करो…अपना-अपना बैंक बैलेंस बढ़ाओ…

दान लेकर सामाजिक सेवा

आज तो धर्म के नाम पर कुछ और ही हो रहा है. आज तो मंदिर, मस्जिद, गिरजे, गुरुद्वारे, हर धर्म स्थल…हर धर्म गुरू…सभी एक ही काम कर रहे हैं. दान लेकर सामाजिक सेवा कर रहे हैं. तभी तो मैं कहता हूं कि धार्मिक व्यक्ति कोई और होता है जबकि सामाजिक गुरु कुछ और…तुम जिन्हें देख रहे हो वो सामाजिक गुरु हैं. धार्मिक तो बिल्कुल भी नहीं. धर्मिेक व्यक्ति होता है लेकिन धर्मिक गुरु कतई नहीं होता. लेकिन तुम तो अपने अपने धर्म गुरुओं को राजनेताओं-अभिनेताओं के साथ फोटो खिंचवाने को ही गौरवान्वित पाते हो. तभी देखना उनके आश्रमों में नेताओं के साथ तस्वीर टंगी रहती है. इसका मतलब क्या है ? तुम्हारी ऊंचाई बढ़ाने के लिए तुम किसी का तो सहारा लेते हो.

जीवन में नृत्य का होना जरूरी

धार्मिक व्यक्ति में तो एक अधार्मिक खूशबू होती है. उसकी तो अपनी मस्ती होती है. उसके भीतर उसकी स्वंय की वीणा बज रही होती है. उसके तो जीवन में एक नृत्य होता है. एक आनंद होता है जो उसकी चाल से झलकता है. तुम देखते हो ना हिरणी की चाल…वो तो एकदम अलग ही होती है. उसी प्रकार जागृत और बोधवान आदमी…उसके तो जीवन का अंदाज ही निराला होता है. उसके जीवन मे रोज उत्सव होता है. वो तुम्हारी तरह साल में एक बार ईद या होली-दीवाली थोड़े मनाता है. उसके जीवन में रोज ही उत्सव होता है.

मंदिर मस्जिद मत जगाओ…स्वंय जागो

जरा धार्मिक चिन्हों को धारण किये हुए अपने धर्म गुरु को देख लेना. कहीं उनके जीवन में कोई उत्सव होता है…हां…मंदिर-मस्जिद में उत्सव मना लेते हैं. लेकिन जीवन में तो कुछ भी नहीं बदलता…ना उनके जीवन से क्रोध गया. ना उनके जीवन से अशक्ति गयी. ना अहंकार गया और ना उनके जीवन से काम-वासना गयी. ना महत्वकांक्षा गयी. ना लोभ गया. कुछ भी तो नहीं बदला. अगर बदल गया होता तो क्या हिंदू-मुस्लिम के नाम पर दंगे होते. नहीं…तो मंदिर मस्जिद मत जगाओ. तुम भगवान को मत जगाओ…स्वंय जागो (Wake up Yourself).

आज केवल इतना ही…शेष किसी और दिन…अंत में चारों तरफ बिखरे फैले परमात्मा को मेरा नमन…तुम सभी जागो…जागते रहो…

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