धर्मो के 4200 प्रकार

धर्मो के 4200 प्रकार

"धर्म"

धर्म क्या है ?

हम बात कर रहे है सत्य धर्म की

सत्य धर्म जिसे बुद्ध ने पाया, महावीर ने पाया,मोह्हमद ने पाया, जीजस ने पाया, नानक ने पाया।

हम उस धर्म की बात नहीं कर रहे है जिसे तुम धर्म कहते हो या जिसे तुम्हारे धर्म गुरु धर्म कहते है। जिसे तुम हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई कहते हो यह तो तुम्हारे अपने अपने सम्प्रदाय है उस सत्य को पाने के जिसे में धर्म कह रहा हू।

लेकिन तुम धर्म को समझ नहीं पा रहे हो अनजाने में तुमने धर्म के नाम पर इन्ही सम्प्रदायो का पिंजरा बना लिया है और तुम उसी पिंजरे में अपने को बंधा हुआ मान रहे हो।

अगर तुम हिन्दू , मुस्लिम, सिख, ईसाई या पूरी दुनिया में 600 से ज्यादा मुख्य धर्म और 3600 उपधर्म कुल 4200  धर्म को ही धर्म मानो तो क्या तुम कह पाओगे की तिलक लगाना धर्म है या चोटी बनाना धर्म है, जनेऊ पहनना धर्म है या कंठी पहनना धर्म है, टोपी पहनकर 5 समय नमाज पड़ना धर्म है या केश रखना धर्म है? इस प्रकार तो पूरी दुनिया के 4200 धर्मो के अलग अलग कृत्य होंगे तो क्या ये सभी भिन्न भिन्न धर्म है?

नहीं धर्म तो भिन्न भिन्न नहीं हो सकते धर्म तो एक ही हो सकता है। ये तो मार्ग है उस सत्य धर्म को पाने का जिसे बुद्ध ने पाया, महावीर ने पाया,मोह्हमद ने पाया, जीजस ने पाया, नानक ने पाया।

हिन्दू , मुस्लिम, सिख, ईसाई या पूरी दुनिया में 600 से ज्यादा मुख्य धर्म और 3600 उपधर्म कुल 4200  धर्म ये तो मार्ग है उस सत्य धर्म को पाने के, लेकिन भ्रम वश हम मार्ग को ही पकड़कर बैठ गए और मूल धर्म के बारे में हम भूल गए।

ये बिलकुल ऐसा ही है जैसे एक बच्चा खेल खेल में ही रेत में अपने छिपने के लिए गड्ढा खोद कर उसमे छिप कर बैठ जाता है बाकि बच्चों से छिपने के लिए और फिर जब अंदर छिपता है तो घबरा जाता है की अब बाहर कैसे आएगा क्योकि जितना हाथ पैर मारेगा वो रेत में उतना ही दबता जायेगा।

ठीक उसी प्रकार तुमने हिन्दू , मुस्लिम, सिख, ईसाई की चार दीवारी लगाई है जैसे बच्चे ने रेत की दिवार बनाई थी तुम हिन्दू , मुस्लिम, सिख, ईसाई ने अपने अपने धार्मिक विचारधाराओ की इतनी मजबूत दीवार बनाई है और उसी दीवार को ही पकड़कर बैठ गए है और चारो तरफ से उसी दीवार में ही कैद हो गए है।

तुम ध्यान से देखना जब एक बच्चा पैदा होता है तो तुम सभी उसे अपने अपने तथाकथित धर्म के अनुसार धार्मिक चिन्हो से अवगत कराना शुरू कर देते हो। हिन्दू परिवार अपने बच्चे को तिलक लगाता है कंठी जनेऊ पहनता है, मंदिर की मूर्तियों से अवगत करवाता है, मुस्लिम परिवार बच्चे को मस्जिद ले जाता है धार्मिक रूप से बनाई गई मान्यता अनुसार खतना करवाते है, उसे नमाज पड़ना सिखाते है, सिख केश रखवाते है गुरूद्वारे ले जाते है, ईसाई चर्च ले जाते है, क्रॉस धारण करवाते है।

लकिन उस बच्चे से कोई भी नहीं पूछता की वो भी कुछ चाहता है या नहीं।

में तुम्हे इन किसी भी मान्यता का विरोध नहीं कर रहा हूँ में तो तुम्हे ये समझाने का प्रयतन कर रहा हू की ये कृत्ये धर्म नहीं है, धर्म इनसे भिन्न और कुछ है।

ध्यान से देखना यही सब कुछ हुआ होगा बुद्ध, महावीर, मोहमद, जीजस, नानक के साथ भी, लेकिन बड़े होकर उन्होंने अपना मार्ग स्वयं खोजा और सफलता भी हासिल की।

अब सोचो अगर उन्होंने भी तुम्हारी तरह अपना मार्ग खोजा होता और केवल तुम्हारी तरह ही धार्मिक होते तो क्या आज तुम बुद्ध, महावीर, मोहमद, जीजस, नानक को  तुम याद रखते ? नहीं क्योकि फिर तो वो भी बिलकुल उसी तरह की धार्मिक होते जिस तरह की धार्मिक तुम 

आज हो।

धार्मिक होना बिलकुल अलग बात है और हिन्दू , मुस्लिम, सिख, ईसाई होना अलग बात है।

तुम ध्यान से स्वयम को देखना हिन्दू सुबह शाम मंदिर जाता है या घर में प्रार्थना करता है और पूरा दिन वो ही कार्य करता है जिससे उसके अहंकार की तृप्ति होती है। मुस्लिम 5 वक़्त की नमाज पड़ता है और बाकि का शेष दिन अपने अहंकार को बढ़ाने का प्रयत्न करता है।

सिख रविवार को गुरूद्वारे में सेवा करता है और बाकि दिन अपने होने को दृढ करता है। ईसाई रविवार को चर्च जाकर अपने पुराने किये हुए पापों का प्रायश्चित करता है और अगला पूरा सप्ताह पुनः वही पाप पुनः करने लग जाता है जिससे उसे अगले रविवार को पुनः जाकर पाप छम्य कराने की विनती करनी पड़े।   

ध्यान से देखना अगर एक बार हमने जाकर अपने पापो की लिए क्षमा मांग ली तो पुनः पाप आये कहाँ से जिसके लिए जाकर पुनः क्षमा  मांगनी पड़ेगी?

यह सब सुबह शाम की धर्म, 5  वक़्त की धर्म, रविवार के धर्म ये धर्म नहीं है ये तो तुम्हारी चालबाजी है स्वयम को धोका देने की स्वयम को उस परमात्मा के सामने धार्मिक साबित करने की लकिन ध्यान रखना परमात्मा तुम्हारी चालबाजियों में फसेगा नहीं।

ध्यान से देखना क्या जब महावीर को एक बार ज्ञान हो गया तो क्या कभी उन्हें दुबारा ज्ञान प्राप्त करने को, कभी दुबारा ध्यान के लिए पुनः जंगल में जाना पड़ा? नहीं। क्या कभी दुबारा उस धर्म को जानने सत्य को जानने दुबारा जंगल भागे? नहीं। क्योकि जिसने एक बार सत्य को जान लिया वो हमेशा के लिए धार्मिक हो गया। उसे पुनः पुनः दुबारा थोड़े ही कही जाना है। और तुम देखो स्वयम को तुम्हे मंदिर मस्जिद या अपने अपने धार्मिक सथलो पर रोज रोज जाना पड़ता है क्योकि तुम धर्म को जान ही नहीं पाए।\

क्योकि जिसने एक बार उस सत्य को जान लिया उस परमात्मा को जान लिया उसको कुछ भी जानना शेष रहा ही नहीं

आज मुझे ये बात तुम्हे फिर से याद क्यों दिलवानी पड़ रही है

क्या में तुमसे ज्यादा अकलमंद हू? नहीं

क्या में तुम्हारा गुरु या सदगुरू  हू? नहीं

क्या में तुमसे ज्यादा पढ़ालिखा हू? नहीं

क्या मैने कोई सिद्धि या साधना की हुई है? नहीं

तुममे और मुझमे केवल अंतर इतना ही है की मै जग गया हू मैंने आंखे खोल ली है मैंने आंखे बंद कर अंध विश्वास करना छोड़ दिया है, तुम्हारे में और मेरे में कुछ भी तो अंतर नहीं है। जो तुम आज हो वो में कल था जो में आज हू वो तुम कल होंगे में भी पहले वो कृत्य करता था जो तुम आज करते हो। मैंने भी पहले अपने चारो तरफ तुम्हारे तथाकथित धर्म रुपी पिंजरा बनाकर स्वयम को कैद कर रखा था।

लेकिन जैसे ही आंख खुली तो सारे मोह भंग हो गये मैने स्वयम को मुक्त पाया स्वयम को उस अस्तित्व में पाया।

"धर्म"

हम धर्म की ही बात कर रहे है धर्म तो वो बोध है वो ज्ञान है जिसे अगर कोई एक बार जान ले तो कुछ भी पुनः जानना शेष नहीं रह जाता। फिर वह जाना हुआ मनुष्य तो मंदिर मस्जिद की लड़ाई लड़ता है और ही दूसरे के धर्म के बारे में कोई अपमान जनक टिप्पणी ही करता है क्योकि वह उस परमात्मा को उस खुदा को पहचान चुका होता है।

आज मै तुम्हे पुनः याद इसलिए भी दिला रहा हू क्योकि तुम धर्म के नाम पर जो जो कृत्ये कर रहे हो वो तुम्हे नित्ये ओर ओर अंधकार की और ले जा रहे है। अंधकार का तात्पर्य अज्ञान नहीं तुम्हारे बंधन से है तुम्हारी रूढ़िवादी विचारधाराओ से है तुम देखो जितने रूढ़िवादी तुम 50 वर्ष पहले थे आज तुम उससे ज्यादा रूढ़िवादी कट्टरपंथी हो गये हो।

तुम स्वयम को देखो क्या तुमने धार्मिक चिन्हो को धारण कर स्वयम को धार्मिक नहीं माना हुआ है क्या? क्या तुम ये नहीं मान बैठै