पुस्तक पढ़ कर कोई धार्मिक होता है क्या?

पुस्तक पढ़ कर कोई धार्मिक होता है क्या?

आज के समाज के परिपेक्ष में इस बात पर पुनः विचार करना आवश्यक हो गया है कि आज विश्व की आबादी 770  करोड़ के आस पास है और सभी मनुष्य धार्मिक होने का दावा करते है और उस दावे के लिए अपने अपने धर्मो का पुरजोर समर्थन भी करते है। लेकिन अगर उन धर्मो पर नजर डाले जिन्हें तुम सभी धर्म कहते हो या उन पुस्तकों पर नजर डाले जिन्हें तुम अपनी-अपनी धार्मिक पुस्तके कहते हो तो ध्यान से देखना पूरे विश्व में तुम्हारी संख्या से ज्यादा धार्मिक पुस्तके छप चुकी होंगी।  अकेले गीता की ही बात करे तो विश्व भर मे जितनी भी भाषाएँ है और जितने भी प्रकाशन है और जो-जो भी धार्मिक संस्थाए गीता का पब्लिकेशन करती है अगर उन सभी को मिला कर गिनती करे तो शायद गीता की संख्या कई सौ करोडो मे होगी। और इसी प्रकार वेद, पुराण, कुरान, बाइबल, ग्रन्थ साहिब, धम्म पद, या सभी धर्मो की छोटी बड़ी पुस्तकों को मिला ले तो ये आंकड़ा 770  करोड़ जो इस समय हमारे विश्व की जनसँख्या है से भी कई गुना ज्यादा पहुँच जाता है। आज एक वो परिवार जिस घर मे 4 लोग रहते है उस घर मे कुल मिला कर छोटी बड़ी सभी धार्मिक पुस्तकों को जोड़ा जाये तो शायद 40 पुस्तके मिल जाएँगी। फिर वो परिवार हिन्दू हो या मुस्लिम, सिख हो या ईसाई, या कुछ और ये पुस्तके भरी ही मिलेंगी।

इतना धर्म प्रचार होने के बावजूद भी आज का मनुष्य दुःखी है अशांत है उद्दिग्न है। आपस मे लड़ मरने को तैयार है।

क्यों?

यानि हम सभी धर्म को समझ ही नहीं पाए हमने धर्म को केवल हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई या कुछ और नाम देकर उसे घेरे मे कैद कर लिया है और उस धर्म को इतना कस कर पकड़ कर बैठ गए है कि ये भूल ही गए कि उस धर्म के साथ हम भी उसी घेरे मे ही बैठे रह गए है और कैद हो गए है।

 

आज धर्म के नाम पर जो जो कृत्य तुम सभी कर रहे हो उसका धर्म से कुछ भी लेना देना नहीं है। धर्म का मतलब तो केवल जागने से ही होता है। फिर तुम गीता पढ़कर जागो या कुरान पढ़कर। अगर जाग गए तो गीता और कुरान में कुछ भी भेद नहीं है और नहीं जागे तो गीता और कुरान, बाइबल और धम्मपद या कोई भी ग्रन्थ सभी व्यर्थ ही है।

इन्ही सब कुरीतियों के बारे मे तुम्हारी आँखे खोले हेतु तुम्हे जगाने हेतु आज एक व्यक्ति ने बीड़ा उठाया है कि लोगो को धर्म का सही ज्ञान बताया जाये लोगो की धर्म के नाम पर जो भी रूढ़िवादी मानसिकता है उसे बदला जाये और धर्म के नाम पर तुम्हारे जो धर्म गुरु सभी को मनगढंत शिक्षा देते है और उन्हें गलत मार्ग पर ले जाकर अपना-अपना स्वार्थ सिद्ध करते है उनके बारे मे लोगो को समझाया जाये। ताकि लोग जागे धर्म की सही-सही परिभाषा को जाने और परमात्मा के दिए इस जीवन रुपी वरदान को जीये की इससे घृणा करे।

धर्म के नाम पर लोगो ने जो दुकाने चला रखी है उनके बारे मे लोगो को समझाया जाये।

तुम देखो समाज में हो क्या रहा है?

लोगो का इतना ब्रेन वाश कर दिया गया है कि लोगो को तो अपना पेट भरना है और ही बच्चों का जीवन उत्तम करना है उससे ज्यादा वो इस बात की चिंता करते है कि ब्राह्मण को रोटी खिला दी जाये। बच्चों के स्कूल की फीस जमा हो या हो पंडित पुरोहित के घर का राशन जरूर भरना चाहिए। क्योकि उसी पंडित पुरोहित और जो-जो भी तुम्हारे धर्म गुरु बन कर बैठ गए है वो तुम्हे झूठा आश्वासन दिए बैठे है कि वो तुम्हे जरूर स्वर्ग, बैकुंठ, मुक्ति, मोक्ष दिलवाएंगे।

आज तुम सभी स्कूल से ज्यादा मंदिर, मस्जिद की बाते करना पसंद करते हो और स्कूल से ज्यादा मंदिर-मस्जिद बनाने की और ध्यान देते हो।

एक सोया सोया व्यक्ति ऐसे सपने देखे तो शायद गलत होगा लेकिन पढ़ालिखा बुद्धिजीवी वर्ग भी इससे अछूता नहीं है। सभी मूढ़ो की भांति सोये सोये भविष्य के सपनो मे व्यस्त है। सभी मरणोपरांत किसी और जीवन मे सुखी होने की कल्पना मे खुश है।

और इसी धर्म के नाम पर तुम्हारे धर्म गुरु कर क्या रहे है जरा उस पर कभी नज़र डाली है तुमने।

कोई दुःख निवारण समाराहों चला रहा है, कोई सितार बजा कर