अपने धर्म का उत्थान चाहने वाला यक़ीनन दूसरे के धर्म का विनाश चाहता है।

अपने धर्म का उत्थान चाहने वाला यक़ीनन दूसरे के धर्म का विनाश चाहता है।

अपने धर्म का उत्थान चाहने वाला यक़ीनन दूसरे के धर्म का विनाश चाहता है।

कोई भी व्यक्ति अगर वह अपने धर्म का तो उत्थान चाहता है और दूसरे के धर्म का विनाश चाहता है तो वह व्यक्ति धार्मिक नहीं है वह तो मनुष्य की अवस्था से भी निचे गिरा हुआ है। वह सम्मान का पात्र नहीं वह तो दया का पात्र है।