आज धर्म केवल भ्रमात्मक हो चुका है।

आज धर्म केवल भ्रमात्मक हो चुका है।

आज धर्म केवल भ्रमात्मक हो चुका है।

आज धर्म क्या हो गया है? आज धर्म केवल भ्रमात्मक हो चुका है। आज धर्म केवल पुरानी धार्मिक मान्यताओ को, सिधान्तो को, विचारधाराओ को ढोना मात्र हो गया है। आज धर्म केवल सोये सोये अनुष्ठान करना मात्र रह गया है। इन कृत्यों के दम पर कोई भी धर्म कब तक जीवित रह सकता है, धर्म को जीवित करने के लिए हम सभी को इसमें अपने प्राण फूकने पड़ेंगे। चेतना क्या है? चेतना तुम्हारा होश है।