कोई उपाए काम नहीं आएगा। अंत में तुम्हारा बोध ही काम आएगा।

कोई उपाए काम नहीं आएगा। अंत में तुम्हारा बोध ही काम आएगा।

कोई उपाए काम नहीं आएगा। अंत में तुम्हारा बोध ही काम आएगा।

उपाय क्या है तुम उपाय क्यों करते हो। क्या उपाय काम करते है।

तुम जितना लोभी होंगे उतना ही तुम दुसरो पर आश्रित होंगे और तुम्हारे तथाकथित उपाय करने वाले महात्मा तो चाहते ही यही है की तुम कोई भी कार्य उनसे पूछे बगैर करो। क्योकि तुम जितनी बार भी पूछने जाओगे उतना ही वो तुमसे रूपया वसूलेंगे।

लोभ के कारण ही तुम जगह- जगह भटकते हो। भिन्ह-भिन्ह तुम्हारे तथाकथित महात्माओ के पास जाते हो की कोई कुछ उपाय बता दे।

भिन्ह-भिन्ह तांत्रिको, अघोरियों के पास जाते हो की कोई तो होगा जो कोई कुछ चमत्कार कर देगा। और मजे की बात तो ये है की तुम्हे ऐसे लूटने वाले मिल भी जाते है।

जरा ध्यान से आँखे मूँद कर देखना अगर उन तथाकथित महात्माओ का लोभ भी समाप्त हो गया होता तो वो ये दुकान खोल कर बैठते।

कोई दुःख निवारण समाहरोह चला रहा है तो कोई रसगुल्ला या गोलगप्पे खिला रहा है। कोई गाय को रोटी देने को कह रहा है तो कोई कुत्ते को रोटी देने को।

कोई सिद्धाश्रम परिवार चला कर शमशान की भभूत बेच रहा है तो कोई भूत सिद्ध करवा कर घर के काम करवा रहा है।

कोई निखिलेश्वरानंद, दिनेशानंद, सुरेशानंद इत्यादि तुम्हे मूढ़ बना कर अपने चरणों को दूध से धुलवा कर तुम्हे वो गन्दा दूध पिलाकर रूपया लूट रहा है तो कोई तुम्हारा घर तबाह कर रहा है।

और मजे की बात तो ये है कि तुम कभी किसी और कभी किसी और उपाए करने वालो के यहाँ फसते रहे हो।

सोचते हो एक उपाए वाला गलत साबित हो गया तो क्या दूसरा कोई तो ठीक निकलेगा। दिनेशानंद गलत था तो कोई बात नहीं सुरेशानंद तो ठीक होगा। लकिन होता क्या है वहा भी तुम उसी प्रकार लुटते हो जैसे पहले लुटे थे।

तुममे से किसी को १० साल हो गए तो किसी को ५० साल उपाए करते करते लेकिन दुःख दूर किसी के नहीं हुए। अगर हो गए तो अब छोड़ तो इन ढोंगियों के यहाँ जाना।

धयान से देखना तुममे से एक भी यह कह पायेगा की उसके दुःख दूर हो गए है।

एक के दुःख अवश्य दूर हो गए होंगे वो भी तुम्हारे रुपये से और वो है तुम्हारे तथाकथित उपाए करने वाले महात्मा।

तुम्हारा तथाकथित महात्मा निखिलेश्वरानंद, दिनेशानंद, सुरेशानंद इत्यादि उनका तो ये बिज़नेस है।

ध्यान से देखना अगर इनके उपाए करने से कुछ भी होता तो सीधी साधी बात है कि जो परमात्मा ने तुम्हारे लिए निर्धारित किया वो गलत हो गया और इन तांत्रिको की शक्ति, इन अघोरियों की शक्ति उस परमात्मा से ऊपर हो गयी।

अब ये तुम्हारी बुद्धि पर निर्भर करता है कि तुम परमात्मा को सर्वोपरि मानते हो या अपने उन तथाकथित महात्मा निखिलेश्वरानंद, दिनेशानंद, सुरेशानंद इत्यादि को।

अगर उपाए से ही सारे काम हो जाते, तंत्र मन्त्र से ही काम हो जाते, शमशान की राख़ से ही काम हो जाते तो जो धनी व्यक्ति होते है या हो बड़े बड़े राजनेता होते है जिन पर कोई रुपये पैसे की कमी नहीं है वो लोग तुम्हारे उन्ही तथाकथित महात्मा निखिलेश्वरानंद, दिनेशानंद, सुरेशानंद इत्यादि का मुँह रुपये से भर कर अपना काम करवा लेते या चुनाव जीत जाते।  या लोग इन्ही से अपने बिज़नेस चलवा लेते।

लेकिन ऐसा होता नहीं है होता बिलकुल इसके उल्टा है। ऐसे पड़े लिखे बुद्धिजीवी धनी लोग तो इन उपाए वालो की तरफ देखते तक नहीं तभी तो ऐसे उपाए करने वाले छोटी छोटी बस्तियों में और कालोनियों में ही अपना धन्दा चलते है।

इन जैसे चमत्कारी तथाकथित महात्मा निखिलेश्वरानंद, दिनेशानंद, सुरेशानंद इत्यादि का धन्दा इन्ही छोटे इलाको में ही चलता है। जहाँ अनपढ़ या अंधविश्वासी लोग ही रहते है। तुम यह मत समझ लेना की कोई पढ़ालिखा या बुद्धिजीवी इनके चंगुल में नहीं फसता। कोई भी  इनके चंगुल में फस सकता है क्योकि इनका काम ही होता है सम्मोहन कर दुसरो को फासना तथा उनका खून चूसना।

इनके चंगुल में हर वो व्यक्ति फस जाता है जिसे किसी भी प्रकार का लोभ होता है फिर वो लोभ चाहे धन का हो या घर का, कार का हो या व्यापर का, स्वर्ग का हो या सिद्धाश्रम का, बैकुण्ठ को हो या गोलोक का। सही तो ये है की लोभ होना ही गलत है।

लोभ का सीधा साधा मतलब ही ये है की तुम यहां संतुष्ट नहीं हो तुम अपनी यथा इस्थिति से सुखी नहीं हो।