जिसे तुम धर्म मानते हो वो धर्म नहीं तुम्हारा अहंकार ही है।

जिसे तुम धर्म मानते हो वो धर्म नहीं तुम्हारा अहंकार ही है।

जिसे तुम धर्म मानते हो वो धर्म नहीं तुम्हारा अहंकार ही है।

"धर्म या अहंकार"

"आओ अब तो धर्म कोई ऐसा बनाया जाये। जिसमे इंसान को इंसान बनाया जाये !!"

सारी दुनिया धार्मिक है कोई हिन्दू है कोई मुस्लमान है कोई सिख है कोई ईसाई है पूरी दुनिया में मुख्य 600 धर्म है और उपधर्म मिलाकर 3600 छोटे-मोटे नाम के धर्म है और ६८०० भाषाएँ है नाम के धर्म इसलिए कहा क्योंकी यह धर्म नहीं सम्प्रदाय है उस धर्म तक पहुंचने के लिए जिसको सत्य धर्म कहते है !!

सत्य धर्म कौन सा होता है ? क्या ये कोई नया धर्म है ?

सत्य धर्म वो धर्म है जिसे बुद्ध,महावीर,मोहमद,जीसस,नानक,कबीर,तथा अनेको ने पाया आज पुनः मैं वही धर्म तुम्हे सीखा रहा हूँ तुम उस सत्य धर्म को पहचानो !

आज इसकी आवश्यकता क्यों पड़ी ? क्योकि तुम्हारे तथाकथित धर्म या सम्प्रदाय में कुछ तो कमी है की जिसके कारण पूरी दुनिया धार्मिक है फिर भी पूरी दुनिया भर में आत्महत्या हो रही है तुम यह जानकर हैरान होंगे की हमारी दुनिया में हर ४० सेकंड में एक व्यक्ति आत्महत्या करता है ! हर वर्ष पूरे विश्व में 8 लाख व्यक्ति आत्महत्या करते है ! दुनिया भर में ज़्यादातर व्यक्ति मानसिक बीमारी में ग्रस्त है !! और तक़रीबन-तक़रीबन हर एक व्यक्ति राग,द्वेष,लोभ,दम्भ से ग्रस्त है !

कोई-कोई विरला ही इससे बचा हुआ है और जो इससे बचा हुआ है उसमे तुम पंडित,मौलवी या अपने धर्म गुरु की गिनती मत समझ लेना !!   

वो तो कोई जागा  हुआ शांत चिंत, धर्म को समझने वाला, आध्यात्म को जानने वाला, तुम्हारे समाज में से ही कोई विरला होगा ! जिसमे सरलता हो,निर्मलता हो, प्रेम हो, आनंद हो ! जो परमात्मा को जनता हो ! वो हिन्दू भी हो सकता हे मुसलमान भी हो सकता है ! सत्य धर्म का हिन्दू, मुस्लमान, सिख, ईसाई से कोई भी लेना देना नहीं है !!

आज पुनः मै वही धर्म तुम्हे सीखा रहा हूँ वह सत्य धर्म है जागरण ! मै चाहता हूँ की तुम जाग जाओ, तुम उसे पहचान जाओ  जो कण-कण में छुपा बैठा है ! तुम पहचानो उसे जो जर्रे-जर्रे में छुपा बैठा है !

तुम्हारे तथाकथित धर्म ने तुम्हे हमेशा से ही भेदभाव सिखाया है ! समता का शब्द, प्रेम का शब्द, दया-निर्मलता यह तो केवल तुम्हारे शास्त्रों में, शब्दों के रूप में ही बचे है ! वास्तविक जीवन में तो यह जीवन से कोसो दूर है !

यह दूर क्यों है? क्योकि तुम्हारे सारे धर्म गुरु एक ही बात दोहराते है और वह यह की उनका धर्म ठीक है और बाकि सबका गलत !

ध्यान देना, सही और गलत एक ही सिक्के के दो पहलु है ! तुम अपने धर्म को जितनी मात्रा में ठीक मानोगे, उतनी ही मात्रा में तुम दूसरे के  धर्म को गलत मानोगे ! नहीं यकीन आता तो स्वयं के भीतर झांककर देख लो !!

इसे साधारण भाषा में यूं समझे की तुम जितनी मात्रा में हिन्दू धर्म के प्रेमी हो ठीक उतनी ही मात्रा में तुम मुस्लमान धर्म के विरोधी हो ! और यह बात केवल हिन्दू पर ही लागू होती है ऐसा मत समझ लेना यह बात मुस्लिम पर भी उतनी ही लागू  होती है जितनी हिन्दू पर !

एक मुसलमान जितनी मात्रा में मुस्लिम धर्म का प्रेमी है ठीक उतनी ही मात्रा में वह हिन्दू धर्म का विरोधी है !

अब इसका मतलब यह मत ले-लेना की क्या सारे धर्मो को त्याग दिया जाये ! मै ऐसा नहीं कह रहा हूँ ! इसका मतलब है तुम अपने आप से प्रथक होकर जब स्वयम को या किसी अन्य वस्तु या धर्म को देखोगे तो तुम्हे तो उस वस्तु या धर्म से राग होगा और ही द्वेष होगा !

जब तक तुम्हे तुम्हारे धर्म में आसक्ति होगी तब तक तुम्हारे भीतर दूसरे के धर्म के प्रति विरोध भी होगा और तुम यह सोचने की भूल मत कर बैठना की तुम्हारे भीतर तुम्हारे धर्म के प्रति प्रेम है यह प्रेम नहीं है  यह तो अहंकार है तुम्हारे अहंकार को  चार चाँद लग जाते है जब तुम्हे यह पता चलता है की आज १०० व्यकतिओ ने अपना धर्म बदल कर तुम्हारा धर्म स्वीकार कर लिया है !!

इसका उदहारण सर्व विदित है ! तुम देखो चाहे तुम  हिन्दू हो या मुस्लमान, चाहे सिख हो या ईसाई, अगर किसी एक को पता चल जाये की की आज समाज में कुछ